Sep 22, 2026

देश का ‘रोपवे हब’ बनेगा उत्तराखंड: 160 किमी लंबे 51 प्रोजेक्ट्स से बदलेगी पहाड़ों की तस्वीर, धामी सरकार का मेगा प्लान तैयार 

post-img

देहरादून। विषम भौगोलिक परिस्थितियों से घिरे देवभूमि उत्तराखंड को देश का पहला ‘रोपवे हब’ बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने एतिहासिक कदम बढ़ाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कड़े निर्देशों के बाद पर्यटन विभाग और विभिन्न कार्यदायी संस्थाओं ने प्रदेश में 160 किलोमीटर लंबी 51 प्रस्तावित रोपवे परियोजनाओं को धरातल पर उतारने की प्रक्रिया तेज कर दी है। सरकार ने चयनित प्राथमिकता वाले प्रोजेक्ट्स का निर्माण कार्य आगामी 9 नवंबर तक शुरू करने का लक्ष्य तय किया है।

उत्तराखंड की पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियों, बढ़ते तीर्थाटन और पर्यटन दबाव के बीच राज्य सरकार अब सड़क के साथ रोपवे को भी परिवहन के अहम विकल्प के रूप में विकसित करने की तैयारी में है। प्रदेश में करीब 160 किलोमीटर लंबे 51 रोपवे प्रोजेक्ट प्रस्तावित हैं, जिन्हें चरणबद्ध तरीके से धरातल पर उतारने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संबंधित कार्यदायी संस्थाओं को चयनित परियोजनाओं पर 9 नवंबर तक काम शुरू करने के निर्देश दिए हैं। सरकार की योजना केवल पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को पहाड़ों तक पहुंचाने तक सीमित नहीं है। प्रस्तावित रोपवे नेटवर्क का उद्देश्य धार्मिक स्थलों और पर्यटन केंद्रों तक आवाजाही आसान करने, पर्वतीय सड़कों पर बढ़ते यातायात दबाव को कम करने और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने से भी जुड़ा है। सड़क निर्माण जहां कई पहाड़ी इलाकों में महंगा और पर्यावरणीय रूप से चुनौतीपूर्ण है, वहीं रोपवे को अपेक्षाकृत कम भूमि में कनेक्टिविटी देने वाले विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। पहले चरण में छह प्रमुख रोपवे परियोजनाओं को प्राथमिकता दी गई है। इनमें रुद्रप्रयाग की सोनप्रयाग-केदारनाथ और कनकचौरी-कार्तिक स्वामी, चमोली की गोविंदघाट-हेमकुंड साहिब और जोशीमठ-औली-गोरसों, नैनीताल की रानीबाग-हनुमानगढ़ी-कैंची धाम तथा उत्तरकाशी की रैथल-दयारा बुग्याल परियोजना शामिल हैइन परियोजनाओं का सीधा संबंध राज्य के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों से है। खासकर केदारनाथ और हेमकुंड साहिब जैसे उच्च हिमालयी तीर्थों तक बेहतर कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की योजना तीर्थयात्रियों की आवाजाही को नया स्वरूप दे सकती है। देहरादून में पुरुकुल गांव से मसूरी लाइब्रेरी क्षेत्र तक करीब 5.2 किलोमीटर लंबे रोपवे का निर्माण कार्य चल रहा है। परियोजना पूरी होने के बाद देहरादून से मसूरी पहुंचने में लगने वाला करीब एक से डेढ़ घंटे का समय घटकर लगभग 15 से 20 मिनट रहने की उम्मीद है। पर्यटन सीजन में मसूरी की सड़कों पर लगने वाले जाम को कम करने में यह परियोजना महत्वपूर्ण हो सकती है। इसी तरह खरसाली/जानकी चट्टी से यमुनोत्री तक रोपवे प्रस्तावित है। इससे श्रद्धालुओं को लगभग पांच किलोमीटर लंबे कठिन पैदल मार्ग से राहत मिलने की उम्मीद है। चंपावत के पूर्णागिरि धाम के लिए ठुलीगाड़ से रोपवे प्रस्तावित है। इस साल 1 अप्रैल से 19 सितंबर के बीच यहां 24 लाख 62 हजार 319 श्रद्धालुओं के पहुंचने का आंकड़ा सामने आया है। ऐसे में बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए वैकल्पिक कनेक्टिविटी की जरूरत स्पष्ट होती है। ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट से पौड़ी स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर तक करीब छह किलोमीटर का रोपवे प्रस्तावित है। पहले चरण में 4.1 किलोमीटर मार्ग विकसित करने की योजना है। हरिद्वार में चंडी देवी और मनसा देवी के लिए इंटीग्रेटेड रोपवे प्रोजेक्ट के तहत मौजूदा अलाइनमेंट के साथ दो नए समानांतर अलाइनमेंट विकसित किए जा रहे हैं। कुमाऊं में हल्द्वानी-नैनीताल-अल्मोड़ा मार्ग पर बढ़ते यातायात को देखते हुए रोपवे को वैकल्पिक कनेक्टिविटी के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। नैनीताल-ज्योलीकोट-हनुमानगढ़ी-कैंची धाम क्षेत्र में चरणबद्ध रोपवे की योजना बनाई गई है। पहले चरण की डीपीआर तैयार होने की जानकारी दी गई है, जबकि कैंची धाम तक दूसरे चरण की डीपीआर तैयार की जा रही है। उत्तराखंड मेट्रो रेल कॉरपोरेशन समेत संबंधित संस्थाओं को विभिन्न मार्गों की व्यवहार्यता जांचने की जिम्मेदारी दी गई है। अल्मोड़ा में रानीखेत-चौबटिया, कसारदेवी-अल्मोड़ा, दूनागिरी क्षेत्र सहित कई मार्गों का अध्ययन हो रहा है। नैनीताल, मसूरी और देहरादून क्षेत्र में भी कई संभावित रोपवे कॉरिडोर चिह्नित किए गए हैं। उत्तराखंड में वर्ष 2025 में छह करोड़ तीन लाख से अधिक पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के पहुंचने का आंकड़ा दिया गया है। बढ़ती आवाजाही के बीच सड़क, रेल और हवाई सेवाओं के साथ रोपवे नेटवर्क को परिवहन व्यवस्था का हिस्सा बनाने की कोशिश राज्य की कनेक्टिविटी रणनीति में बड़ा बदलाव है। हालांकि इतने बड़े नेटवर्क की सफलता केवल परियोजनाओं की घोषणा और निर्माण शुरू होने से तय नहीं होगी। सुरक्षा मानकों, पर्यावरणीय प्रभाव, किराया, स्थानीय लोगों की पहुंच, रखरखाव और आपातकालीन व्यवस्था को समान प्राथमिकता देनी होगी। यदि इन पहलुओं पर संतुलित ढंग से काम हुआ तो रोपवे उत्तराखंड के दुर्गम भूगोल को नई कनेक्टिविटी देने के साथ पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।